गुरुवार, 30 जुलाई 2015

गूगल नाउ से ऐसे भेजें व्हाट्स ऐप, वाइबर मैसेजेस


गूगल अपने उपभोक्ताओं के लिए एक बहुत ही रोचक अपडेट ला रहा है, इसके तहत यूजर्स व्हाट्स ऐप और वाइबर जैसी थर्ड पार्टी ऐप्स पर मैसेजेस गूगल नाउ के सहारे भेज सकेंगे।

इसका मतलब अब आपको मैसेजिंग ऐप्स पर लंबी-चौड़ी टाइपिंग करने की जरूरत नहीं रह जाएंगी बल्कि गूगल का वर्चुअल असिस्टेंट गूगल नाउ आपके लिए यह काम सिर्फ एक बोली पर कर देगा। उदाहरण के लिए- आप एक मैसेज बोलेंगे और उसे गूगल नाउ को व्हाट्स ऐप के सहारे भेजने के लिए कहेंगे तो वह चला जाएगा।

यूजर्स गूगल नाउ से व्हाट्स ऐप के साथ-साथ वी चैट, वाइबर, टेलीग्राम और नेक्स्ट प्लस के द्वारा भी मैसेजेस भेज सकेंगे। गूगल नाउ का यह फीचर फिलहाल क्विक ईमेल, हैंग आउट और टेक्स्ट मैसेजिंग सेवा के साथ कार्य करने में सक्षम है लेकिन नए अपडेट में इसे ज्यादा एडवांस बनाने की कोशिश की गई है।

इस बारे में गूगल ने अपने ब्लॉग पोस्ट पर जानकारी देते हुए कहा कि गूगल नाउ थर्ड पार्टी एप्लिकेशन के साथ कार्य करने में सक्षम होगा।

दरअसल, मैसेजिंग सेवा को आसान बनाने के लिए गूगल द्वारा इस तरह की कोशिश की जा रही है। एंड्रायड फोन पर यह सेवा फिलहाल इंग्लिश में उपलब्ध होगी, मगर कंपनी का कहना है कि जल्द ही इस सेवा से अन्य भाषाओं को जोड़ा जाएगा। हालांकि इस्तेमाल के समय ध्यान रखना होगा कि यह सर्विस सभी एप्लिकेशन के नए वर्जन के साथ ही काम करेगी।

इस फीचर का प्रयोग करने के लिए आपको 'ओके गूगल' कमांड देनी होगी और फिर जिस ऐप के सहारे मैसेज सेंड करना है उसका नाम लेकर, जिस कॉन्टैक्ट को भेजना है उसका नाम बोलकर मैसेज बोल देना होगा। उदाहरण के लिए आप गूगल नाउ से व्हाट्स ऐप मैसेज ऐसे भेजेंगे:

1. पहले ‘ओके गूगल’ बोलें।

2. गूगल नाउ के एक्टिव होते ही, सेंट व्हाट्स ऐप बोले और फिर अपनी फोन बुक में उपलब्ध उस व्यक्ति का नाम बोलें जिसे मैसेज भेजना चाहते हैं।

3. अब जो मैसेज भेजना है उसे बोलें।

और बस अब आपका मैसेज संबंधित व्यक्ति को उस थर्ड पार्टी एप से चला जाएगा।
साभार: naidunia.jagran

मंगलवार, 13 मई 2014

कम्प्यूटर स्ट्रैस सिन्ड्रोम : कारण एवं निवारण


वाहन चलाते समय आपने अनुभव किया होगा कि जब तक गाड़ी बढ़िया चलती है, आपको कोई परेशानी नहीं होती और आप सही तरीके से जिन्दगी के मजे लूटते हैं परन्तु जैसे ही आपकी गाड़ी, चाहे वो स्कूटर हो या कार अथवा कोई और वाहन, कि समस्या की वजह से खराब हो जाए, चाहे वह छोटा सा ही वाहन के पहिए के पंक्चर होने जैसा ही क्यों न हो या वाहन बन्द हो जाए अथवा किसी कारण खड़ा हो जाए तो आप अच्छे- खासे परेशान हो जाते हैं। ठीक इसी प्रकार यदि आप कम्प्यूटरों का प्रयोग करते हैं तो आपने अनुभव किया होगा कि कोई प्रोग्राम चलते-चलते क्रैश हो जाता है, कभी कोई प्रोग्राम हाल्ट हो जाता है, कभी कोई फाइल करप्ट हो जाती है, कल अच्छी-खासी चल रही सी.डी. आज डाटा पढ़कर नहीं देती है। कुल मिलाकर चलते-चलते वाहन में किसी खराबी की वजह से उसमें आई रूकावट की तरह की ही समस्या और वैसी ही परेशानी। इन समस्याओं की वजह से आप परेशान रहने लगते हैं, तनाव में रहने लगते हैं, आपकी दैनदिनी आदतों में चिड़चिड़ापन और रैस्टलेसनेस आ जाता है। यही कम्प्यूटर स्ट्रैस सिन्ड्रोम कहलाता है। एक अध्ययन के मुताबिक कम्प्यूटरों का प्रयोग करने वाले लगभग 40 प्रतिशत लोग जाने-अनजाने और चाहे-अनचाहे कम्प्यूटर स्ट्रैस सिन्ड्रोम से यदा-कदा ग्रस्त हो ही जाते हैं।
कम्प्यूटर स्ट्रैस सिंड्रोम के कारक
* वायरस और मालवेयर, जो आपके कम्प्यूटर और डाटा पर सर्वदा खतरा बने रहते हैं और यदा-कदा आपका महत्वपूर्ण डाटा करप्ट कर देते हैं और जानकारियां चुरा लेते हैं।
* स्पैम, अत्यावश्यक संदेशों के बीच चले आये अवांछित ई-मेल, जिनसे आपका दिमागी पारा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है।
* नये हार्डवेयर, जो पुराने आपरेटिंग सिस्टम और प्रोग्रामों में ठीक से नहीं चलते।
* सॉफ्टवेयर के नये संस्करण, इन्हें या तो फिर से नये सिरे से सीखना होता है या फिर ये पुराने हार्डवेयरों/प्रोग्रामों को चलने-चलाने में समस्याएं उत्पन्न करते हैं। उदाहरण के लिए, हाल ही में एक अति लोकप्रिय व प्रभावी एंटीवायरस औजार का नया संस्करण स्वचालित अपडेट होते ही ‘विंडोज एक्सपी’ को क्रैश कर बन्द कर दे रहा था। नतीजतन सैकड़ों लोगों की रातों की नींद और दिन का चौन ले उड़ा यह प्रोग्राम अपडेट, जिससे कम्प्यूटर प्रयोक्ता अनावश्यक रूप से कम्प्यूटर स्ट्रैस सिन्ड्रोम के शिकार हो गये।
* आब्सलीट, प्रचलन से बाहर तकनीक, कम्प्यूटर टैक्नोलॉजी ऐसी टेक्नोलॉजी है, जिसमें नित्य, घंटे के लिहाज से परिवर्तन हो रहे हैं और नयी-नयी उम्दा चीजें चली आ रही है। लिहाजा आपको अपने आप को भी अद्यतन बनाये रखना जरूरी है अन्यथा देखते-देखते आप व आपका ज्ञान भी प्रचलन से बाहर हो जायेगा। चार साल पहले एचटीएमएल की पूछ परख होती थी, फिर डीएचटीएमएल आ गया। अब एक्सएमएल का जमाना आ गया है और नया एचटीएमएल 5 पदार्पण कर रहा है। तो इन तकनीकों के प्रति जानकार बने रहने के लिए हर किस्म की कसरत करनी पड़ती है, जो अंततोगत्वा कम्प्यूटर स्ट्रैस सिन्ड्रोम का कारक बनती है।
* सिस्टम की धीमी गति, इससे भी आपको परेशानी हो सकती है। कोई जरूरी ई-मेल किसी ने आपको भेजी है। आप इंतजार कर रहे हैं मगर सर्वर बिजी है। कोई बड़ी फाइल डाउनलोड होने में जरूरत से ज्यादा समय ले रही है और रेस्टलैस हो रहे है, क्यों उसे तो अभी ही बॉस को प्रेजेंट करना है।
* सपोर्ट व सहायता, ये दोनों चीजें भी आपके कम्प्यूटर स्ट्रैस सिन्ड्रोम को बढ़ा सकते हैं। आमतौर पर वैसे तो सपोर्ट व सहायता का मुख्य काम है आपके कम्प्यूटिंग में आ रही समस्याओं का त्वरित और सही निदान करना मगर अक्सर आप पाते हैं कि आपकी समस्या या तो ठीक से समझी नहीं जा रही है या फिर उसका ठीक से निदान नहीं बताया जा रहा है। कभी-कभी आपकी किसी ठोस कम्प्यूटिंग समस्या का कहीं कोई निदान भी नहीं होता। मगर आपको तो परिणाम चाहिए। नतीजा होता है ढेर सारा फ्रस्ट्रेशन और अंत में आप कम्प्यूटर स्ट्रैस सिन्ड्रोम के शिकार हो जाते हैं।
कैसे बचें कम्प्यूटर स्ट्रैस सिंड्रोम से?
कोई विशेष नियम कायदा या कानून नहीं है मगर आप कुछ विशेष बातों का पालन कर इससे बचने की कोशिश तो कर ही सकते हैं। किसी भी कम्प्यूटिंग समस्या को यूं समझें कि यह किसी चलते वाहन की ओवरहॉलिंग या तेल-पानी की आवश्यकता के लिहाज से जरा-सा व्यवधान है। बारम्बार आ रही समस्याओं के लिये वैकल्पिक उपाय या वैकल्पिक साधन जुटाएं। सही, भरोसेमंद उत्पादों का प्रयोग करें व जहां सपोर्ट व सहयोग अच्छा मिलता है, वह प्लेटफॉर्म अपनाएं। कम्पनियों को भी अपने उत्पाद व सेवाओं में उत्कृष्टता लानी होगी। उन्हें ऐसे उत्पाद बनाने होंगे, जो भरोसेमंद तो हो ही, नए संस्करण भी आराम से चलें, वे बैकवर्ड कम्पेटिबल तो हों ही, उन्हें चलाने में बहुत ज्यादा सीखने इत्यादि की आवश्यकताएं न हों। उदाहरणार्थ, विंडोज का पूर्व का नया संस्करण विंडोज विस्टा न सिर्फ अलग किस्म का था (जिसमें प्रयोग करने के लिए बहुत कुछ नये सिरे से सीखना है), साथ ही पुराने प्रोग्रामों व हार्डवेयरों को नहीं चलाता था, जिसके कारण कई प्रयोक्ताओं को कम्प्यूटर जनित स्ट्रैस का सामना करना पड़ा। इन बातों को ध्यान में रखकर विंडोज-7 संस्करण लाया गया, जो प्रयोक्ता फ्रैंडली तो है ही, पुराने प्रोग्रामों व हार्डवेयरों को भी बढ़िया तरीके से चलाता है। पूर्ववर्ती संस्करणों से ज्यादा स्थिर और सुरक्षित भी है, जिससे कम्प्यूटरों पर काम करने वालों को बहुत सी समस्याओं से निजात मिली है। जो भी हो, अगर आप दिन भर में अच्छे खासे समय तक कम्प्यूटर प्रयोग करते हैं तो अपने आप को कम्प्यूटर जनित स्ट्रैस से बचा तो नहीं सकते मगर इसे ‘सिन्ड्रोम’ बनने से रोक तो सकते ही हैं। बस, थोड़ा ध्यान रखें।
Ranchi Express

शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

FACEBOOK पर फेक अकाउंट


आज सोशल नेटवर्किंग की हमारी दुनिया में बहुत अहम जगह बन गई है। लाखों लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका फेसबुक इस्तेमाल करने में आसान है और एंटरटेंमेंट का साधन भी है। इसमें कोई शक नहीं कि फेसबुक दुनिया की सबसे पॉपुलर साईट बन चुकी है। इस सोशल नेट्वर्किंग साईट ने इंटरनेट की दुनिया में सबसे ज्यादा यूजर्स को जोड़ा है। इसके यूनिक शेयरिंग और लाइक के कारण लोगों तक इसकी पहुंच बहुत तेजी से हुई। युवा तो युवा, बच्चे और बूढ़े भी फेसबुक से चिपके रहते हैं। एक पुरानी कहावत है कि सिक्के के दो पहलू होते हैं। फेसबुक की लोकप्रियता के चलते इसका गलत इस्तेमाल भी हो रहा है। कई लोग फेसबुक पर फेक अकाउंट बना कर दूसरों को परेशान करते हैं। इतना ही नहीं कई तरह के साइबर क्राइम का कारण भी फेसबुक बन चुका है। फेसबुक पर कई बार हैकर्स भी फेक अकाउंट का सहारा लेते हैं। 2012 में जारी की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक 76 मिलियन अकाउंट फेक साबित हुए थे। इस वजह से सेलेब्रिटी पेज जैसे लेडी गागा के ऑफिशियल फैन पेज पर 65,505 फेक लाइक थे। खुद फेसबुक के पेज पर 1,24,919 फेक लाइक थे। फेक अकाउंट को पहचानना काफी आसान होता है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं किस तरह से आप फेसबुक पर बने फेक अकाउंट को पहचान कर उससे बच सकते हैं। प्रोफाइल पिक्चर और अन्य फोटोज- किसी भी रियल अकाउंट होल्डर की कम से कम एक या दो असली तस्वीरें फेसबुक पर होती हैं। अगर आपको कोई रिक्वेस्ट आती है तो सबसे जरूरी है कि आप अंजान व्यक्ति की प्रोफाइल चेक करें। अगर उसमें कोई भी रियल फोटो नहीं दिखती है तो हो सकता है कि यह फेक प्रोफाइल हो। अगर कोई असली जैसी लगने वाली फोटो दिखती है तो उसे आप गूगल पर सर्च भी कर सकते हैं। इसके लिए 1. जिस फोटो को सर्च करना है उसे अपने डेस्कटॉप पर सेव करें। 2. अपना ब्राउजर खोलें। 3. गूगल इमेज पर जाकर फोटो को ड्रॉप कर दें। गूगल अपने आप उस फोटो से मिलती-जुलती हर फोटो आपको दिखा देगा। नेम सर्च- सिर्फ फोटो ही नहीं अगर आपको किसी भी प्रोफाइल के फेक होने का शक है तो उस प्रोफाइल नेम को भी गूगल सर्च कीजिए। अगर वो असली नाम होगा तो गूगल पर कोई ना कोई मिलता-जुलता सर्च रिजल्ट आपको मिल ही जाएगा। सेलेब्रिटी प्रोफाइल- अगर किसी ऐसे इंसान ने आपको प्रेंड रिक्वेस्ट भेजी है जो कोई लोकप्रिय इंसान होने का दावा करता है तो सावधान हो जाएं। कोई भी सेलेब ऐसे किसी को रिक्वेस्ट नहीं भेजता। एक सर्वे के मुताबिक ऐसे केस में 90 प्रतिशत फेक अकाउंट होते हैं। फेक जेंडर- एक रिसर्च के मुताबिक 95 प्रतिशत फेक अकाउंट किसी लड़की के नाम से बनाए जाते हैं। पुरुषों को लड़कियां आकर्षक लगती हैं और लड़कियों से किसी लड़की की अच्छी दोस्ती हो सकती है। इसलिए किसी भी अंजान लड़की को दोस्त बनाने से पहले पूरी तरह से जांच पड़ताल कर लें। ना करें अजनबियों से बात- अगर कोई आपको प्राइवेट मैसेज भेज रहा है तो उसकी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करने से पहले कम से कम 2 बार सोच लें। अगर आप किसी अजनबी की फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करना चाहते हैं तो उसके असली दोस्तों, प्रोफाइल पिक्चर के बारे में जांच-पड़ताल करने से झिझकिए मत। बर्थ डेट चेक करें- यह बात ध्यान देने योग्य है कि फेसबुक पर फेक अकाउंट बनाने वाले लोग 1/1/XX और 31/12/XX जैसी डेट ऑफ बर्थ का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। प्रोफाइल को ध्यान से पढ़ें- जो लोग फेक अकाउंट बनाते हैं उनकी प्रोफाइल में या तो एडुकेशन डीटेल्स होती ही नहीं है या फिर किसी ऊंचें संस्थान का नाम दिया होता है। कभी-कभी कोई 24 साल का इंसान दावा करता है कि वो किसी कंपनी का CEO है। ऐसे लोगों से बचना चाहिए। स्टेटस अपडेट, कमेंट, लाइक- अगर कोई फेक अकाउंट है तो उसे बनाने वाला इंसान फेसबुक के किसी भी सोशल ईवेंट पर कम रहेगा। ना ही ज्यादा स्टेटस अपडेट होगी और ना ही कमेंट और लाइक। ऐसे अकाउंट से बचना चाहिए। फेक यूजर को करें अनफ्रेंड- सारी जांच पड़ताल करने के बाद अगर आपको लगता है कि यूजर फेक है और उसकी रीक्वेस्ट आप एक्सेप्ट कर चुके हैं तो उसे फौरन अनफ्रेंड कर दें।
(ratantimes)